लौट कर आया गुजरा मौसम
लौट कर आया गुजरा मौसम
गुजरा मौसम आज फिर लौट आया
लाया है कुछ सदमे कुछ अच्छाइयाँ
बचपन की सुबह और गुलाबी शाम
ज़ुल्फ़ों में बाँध पहाड़ों की परछाइयाँ
पुरानी यादों के बादल फिर मंडराये
पलकों से रिमझिम बौछार होने लगी
कुछ छींटे मस्त हवाओं में झूलने लगे
कुछ से अहसासों की जमीं रोने लगी
कुछ यादें तो इतनी दिली और भावुक
कि समा गयी इन पलकों की छाँव में
कुछ मायूस हैं जो शिकायत करती हैं
कि गौरैया अब नहीं चहकती गाँव में
गुजरे मौसम की चादर में सिमटी हुई
पुराने यादों की नादाँ नन्हीं कलियाँ हैं
बेतरतीब सलवटों में लिपटकर बैठी
अल्हड बचपन की अँधेरी गलियाँ हैं
बहती हवाओं के झरोखों से आज भी
झाँक रही है लड़कपन की नादानियाँ
बादलों का कारवाँ भी हुआ था हैरान
देखकर बचपन की मासूम शैतानियाँ
अतीत की धुंधली यादों के खंडहर में
टहलने नहीं आती अब वैसी तन्हाइयाँ
बहारों में मौसम इश्क़ का आज भी है
मगर गूंजती नहीं अब वहाँ शहनाइयाँ।
