STORYMIRROR

अनजान रसिक

Romance Classics Inspirational

4  

अनजान रसिक

Romance Classics Inspirational

क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?

क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?

2 mins
364

जीने का, जीवन निर्वाह करने का स्वयं का तंत्र है

मेरे पास इसलिए स्वतंत्र हूँ मैं,

पर अगर स्वतंत्र सोच मैं रखूँ, तो ज़माना घमंडी,

निर्लज और ना जाने किन किन नामों से पुकारने लगता है,

क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ? 


आज़ाद हिन्द की मिट्टी पर जन्मी

भारत माँ की संतान हूँ इसलिए स्वतंत्र हूँ मैं,

पर अगर स्वतंत्र जीवन जीना चाहूँ तो बहुतों के दिलों में

टीस जग जाती है,क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?


मंदिर मस्जिद में मैंने कभी फर्क ना किया,

आखिर भगवान तो सबका एक है और स्वेच्छा से

इबादत करने को स्वतंत्र हूँ मैं,

पर समाज ने मुझे बेड़ियाँ पहना दीं,

अल्लाह के दरबार में जाने से भी रोक लगा दी,

क्या सचमुच स्वतंत्र हूँ मैं ?


स्वावलम्बी हूँ, पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल सकती हूँ तो

क्यों कष्टों और त्यागों की मिसाल बनूँ मैं, आखिर स्वतंत्र हूँ मैं 

पर खटकती हूँ लाखों की नज़रों में जो हिदायत देते

अपनी हद में रहने की मुझको, क्या सच में स्वतंत्र हूँ मैं ?


लेकिन अब समय आ गया है आवाज़ अपनी बुलंद करने का,

समझाने का, कंठस्थ करवाने का कि स्वतंत्रता के मायने और कायदे

किसी जाति, लिंग या धर्म के मोहताज नहीं,


स्वतंत्र हर नर है तो स्वतंत्रता के रसपान का

नारी को भी बराबर अधिकार है, वह इस परिपेक्ष से बाहर नहीं।

पशु-पक्षियों,पेड़ - पौधों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठाई है,

अब नारी की सुरक्षा के लिए भी आवाज़ उठा कर देखो,


स्वतंत्र जीवन स्वयं जीयो, स्वतंत्र जीवन निर्वाह नारी को भी करने दो,

स्वतंत्रता को सभी बंधनों से स्वतंत्र रहने दो।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance