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Rekha Mohan

Abstract


3.2  

Rekha Mohan

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कविता

कविता

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ए मेरे मन तू जिंदगी को जी,

उसे समझने की कोशिश न कर।

सुन्दर सपनों के ताने बाने बुन,

उसमे उलझने की कोशिश न कर।

चलते वक़्त के साथ तू भी चल,

उसमें सिमटने की कोशिश न कर।

अपने हाथो को फैला,खुल कर साँस ले,

अंदर ही अंदर घुटने की कोशिश न कर।

मन में चल रहे युद्ध को विराम दे,

खामख्वाह खुद से लड़ने की कोशिश न कर।

कुछ बातें भगवान पर छोड़ दे,

सब कुछ खुद सुलझाने की कोशिश न कर।

जो मिल गया उसी में खुश रह,

जो सुकून छीन ले वो पाने की कोशिश न कर।

रास्ते की सुंदरता का लुत्फ़ उठा,

मंजिल पर जल्दी पहुचने की कोशिश न कर ।।

गर्म हवाओं ने धावा बोला है जल्दी देश में इस बालगता है मन तन की सरसराहट में फिज़ाओ का पहरा।


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