कविता/मैं जमीन हूँ
कविता/मैं जमीन हूँ
मैं जमीन हूँ, सम्पत्ति हूँ, जायजाद हूँ,
कभी पिता की पगड़ी,
तो कभी बेटे का विवाद हूँ।
थम गई तो,
मेरे सीने पर दीवारें उठ जाती हैं,
घर बनते हैं, आँगन हँसते हैं,
चूल्हे जलते हैं, बच्चे दौड़ते हैं,
मैं आबाद हूँ।
और चल गई तो,
वही दीवारें लाशें बन जाती हैं,
वही आँगन मसान बन जाते हैं,
जिन्हें सींचा था पसीने से,
वही पल में राख हो जाते हैं,
मैं बर्बाद हूँ।
मैं गवाह हूँ, मैं सबूत हूँ,
कभी खून से सनी,
कभी फूलों-सी महकती हूँ,
तुम नापते हो मुझे गज में,
मैं युगों को नापती हूँ।
मत समझो कि मैं चुप हूँ,
सह लूँगी सब कुछ,
मैं जब-जब हिली हूँ,
तख्त-ओ-ताज हिल गए हैं,
और जब-जब थमी हूँ,
इंसान ने इतिहास लिखे हैं।
जगन्नाथ "पृथक"
