दीवारों के कान
दीवारों के कान
कुछ बातें संभाल कर करना,
क्योंकि
दीवारों के कान निकल आए हैं,
ये जो ईंट, गारे से बनी दीवार है,
ये अब ईंट-गारा की नहीं रहीं,
इन्होंने तुम्हारी हँसी सुनी है,
तुम्हारी सिसकी सुनी है,
आधी रात को जब तुमने, उसका नाम
फुसफुसा कर लिया था,
ये दीवारें तब जाग गई थीं।
यहाँ हर खिड़की, एक आँख बन गई है,
हर दरार एक होंठ,
हर पर्दा जासूस है,
और ये छत...
ये छत तो सबसे बड़ी गवाह है,
जिसने तुम्हें, बिना छत के
होते हुए देखा है,
इसलिए
मत लेना उसका नाम इतने सुर में,
मत रखना उसकी चिट्ठी,
तकिये के नीचे,
मत देखना उसकी गली देर तक,
लोग नहीं, अब दीवारें बताने लगी हैं किस्सा
क्योंकि "पृथक" सच ही कहा रहा है
दीवारों के कान निकल आए हैं,
कुछ बातें संभाल कर करना।
-जगन्नाथ "पृथक"
