कविता/बादल का दर्द बरसता है
कविता/बादल का दर्द बरसता है
तड़पना जिनकी किस्मत है,
तो मिलना क्या बिछड़ना क्या।
अंधेरों में बसर जीवन,
सवेरा क्या उजाला क्या॥
सूखे कंठ से जब पपिहा,
पीहू-पीहू रटता है,
जब समझ न पाये कोई उसे,
वो तड़फ छुपाये फिरता है,
उसकी हालत को देख ''पृथक'',
बादल का दर्द बरसता है....।।
उसने इंसान को जन्म दिया,
की भूल थी शायद नही कोई,
था रंग लहू का एक तरह,
तब थी शत्रुता नही कोई,
इस वहशी को समझाने ''पृथक'',
बादल का दर्द बरसता है....।।
जब मधुर मिलन की बेला में,
आ जाये अगर कोई प्रलय,
किस्तों-किस्तों में बिखरा हो,
स्नेह भरा कोई ह्रदय,
उसकी तपन से तब ''पृथक'',
बादल का दर्द बरसता है....।।
रचना-: जगन्नाथ "पृथक"
9926423930
