उसकी शाख
उसकी शाख
वो आज तक नहीं बदला,
और कई बार अगर बदलना भी चाहा,
पर अपने स्वभाव के कारण, बदल न सका,
कई वर्षों के बाद भी,
वैसा ही लम्बा-चौड़ा शरीर,
वैसी ही अकड़, वैसा ही स्वभाव,
आने-जाने वाले उसको देखकर,
देखते ही रह जाते थे,
सो आज भी,
उसकी शाख, आस-पास के
घरों में तो है ही,
साथ-साथ, दूर-दूर तक है,
मेरी समझ से
उसको कोई न जाने-पहचाने,
ये संभव नहीं है,
कोई भी उसकी कद-काठी के बराबर,
मुझे आज तक नजर नहीं आया,
जैसे बनाने वाले ने उसको,
अलग से ही बनाया हो,
उसकी कद-काठी के अनुसार,
कई लोग भी एक साथ,
टस से मस नहीं कर सकते,
और अगर कोई उस पर वार भी कर दे,
तो वह चुपचाप सह लेता है,
इतना विशाल होने के बाद भी,
किसी से कुछ नहीं कहता,
चुप-चाप खड़ा रहता है,
मेरे घर के सामने वाला "इमली का पेड़"।
-रचना-: जगन्नाथ"पृथक"
