जिंदगी है मौत तो आकर रहेगी
जिंदगी है मौत तो आकर रहेगी
जिंदगी है मौत तो, आकर रहेगी
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
जिंदगी है मौत तो, आकर रहेगी...
खिड़कियों की ओट से, शर्माई सी वो
इक दिन मिलने आयेगी, घबराई सी वो
दूरी तब नजदीक में बदली सी होगी
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
जिंदगी है मौत तो, आकर रहेगी...
हाल होगा घर में, रो-रो के बुरा
कुछ कहेंगे अच्छा था, और कुछ बुरा
कुछ पड़ोसी आँखों से, बरसात होगी
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
जिंदगी है मौत तो, आकर रहेगी...
यादें ही रह जायेंगी, बस हर तरफ
बातें ही रह जायेंगी, चारों तरफ
तड़के वाली हर जवाँ पर, बात होगी
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
जिंदगी है मौत तो, आकर रहेगी...
मौत की सैया पे, जब सो जाऊँगा
चार शाना पर मैं, उठ कर जाऊँगा
वो नजारा देख ना, मैं पाऊँगा
मन ही मन मैं बहुत घबराऊँगा
बात इतनी सी, हमेशा चुभेगी
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
जिंदगी है मौत तो, आकर रहेगी...
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
वक्त के हाथों न फिर, टाले टलेगी
रचना-: जगन्नाथ "पृथक"
