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जगन्नाथ "पृथक"

Classics Inspirational Others

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जगन्नाथ "पृथक"

Classics Inspirational Others

खुद से मुलाकात

खुद से मुलाकात

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भागती-दौड़ती इस दुनिया में,
दूसरों की खातिर बहुत जी लिए।
गैरों की हसरतें पूरी करते-करते 
आंसुओं के कई समंदर पी लिए।
ज़िंदगी की इस अंधी दौड़ में,
यूँ ही उम्र भर न चलते जाना,
कभी वक्त मिले तो फुर्सत से,
तुम अपने आप से भी मिल लेना।

सबकी पसंद का ख्याल रखा,
सबका हाल-चाल तुम पूछते रहे।
कोई रूठ जाए तो रो पड़ते हो,
घंटों अकेले में सोचते रहे।
अपनों के रूठने मनाने में
कहीं खुद से ही न रूठ जाना,
कभी वक्त मिले तो फुर्सत से,
तुम अपने आप से भी मिल लेना।

चेहरे पर झूठी मुस्कान लपेटकर
कब तक यूँ ही घूमोगे।
औरों की महफ़िल की खातिर,
कब तक पाँवों से झूमोगे।
आइने के नज़दीक भी आकर
ज़रा अपने आप को पढ़ लेना,
कभी वक्त मिले तो, फुर्सत से
तुम अपने आप से भी मिल लेना।

बचपन के वो अधूरे सपने,
जो इस भागदौड़ में कहीं खो गए।
ज़िम्मेदारियों के भारी बोझ तले,
जो न जाने कब के सो गए।
उन दबे हुए ख़्वाबों की राख से,
फिर एक नया चराग़ जला लेना,
कभी वक्त मिले तो, फुर्सत से,
तुम अपने आप से भी मिल लेना।

दुनिया की इस भीड़ में "पृथक"
हरेक चेहरा अनजान सा है।
मकान तो सबने बना लिया,
पर हर कमरा वीरान सा है।
इस बेरहम ज़माने के हवाले,
तुम अपनी सादगी मत करना,
कभी वक्त मिले तो, फुर्सत से,
तुम अपने आप से भी मिल लेना।

                      जगन्नाथ "पृथक"


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