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Kusum Kaushik

Classics

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Kusum Kaushik

Classics

कुआर-कातिक

कुआर-कातिक

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कुआर कातिक के आते दो महीने
लगे है जैसे साल ने गहने पहने
सोलह दिन श्राद्धों के और फिर नौराते
पूरा महीना बस भागते ही रह जाते
पितरों की पूजा की तैयारी में रात से ही जुट जाते
खीर के लिए दूध और अन्य आवश्यक सामग्री पहले ही ले आते
पंडित जी को न्यौता और घर के मान भी बुलाने हैं
भोजन करा,आदर दान के साथ विदा भी कराने हैं
 नित नये पकवानों से पितर जिमाये जाते हैं
मावस को फिर आदर से सभी विदा कराये जाते हैं
अब आये नौराते देवी के नौराते
यही तो है जो घर की शुद्धि व सज्जा करवाते
एक दिन पहले झांझी लगती
रोज सबेरे उन्हें जिमा कर
संझा को फिर गबते गीत
मंदिर जाकर धोक लगाना
घर में अपने ज्वारे बोना
उपवासों की अलबेली रीत
वैसे तो होता है रोज पर
नौमी को फिर कन्या भोज
करते सभी माता के भगित
अगले ही दिन आया दशहरा
सुबह सबेरे कुल्लो पूजो और करो शस्त्रों की पूजा
गले लगाओ, पान खिलाओ काम करो न दूजा
 संझा को रावण फूकेंगे चाहे घर या बाहर
सीख मिलेगी सदा यही मत बन तू रे नर अब नाहर
चार रोज का ब्रेक मिला है कर लो
कातक की तैयारी
करवा चौथ और अहोई आठें
उपास बड़े हैं भारी
आठए दिन फिर दीप जलेंगे
जगमग होगी धरनी सारी
दीपक, लड़ियां और फुलझङ़ियां
खील बताते और पटाखे
जीत हुई है आज सत्य की
मिलकर यही सिखाते
अब गोधन को घर घर कैसे
गोधन मांडू धरे जायेंगे
फिर संझा को खीर पुआ से
मिलकर बाबा पूजे जाऐंगे
सुबह दौज को फिर बहनें
वीरन पे बलि बलि जायेंगी
आरती-टीका-गोला-मीठा
सब कुछ भेंट चढाऐंगी
अब बस सोए देव उठेंगे
जब आएगी नई कपास
नये काज और ब्याह होएंगे
पूरी होंगीं मन की आस
कतकइयों के पूरे होंगे कातक के स्नान
इस विध प्रेम से बीतें ये दोनों मास महान


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