"कठपुतली "
"कठपुतली "
बनकर संचालक
कठपुतली का खेल
खेल रहा है भगवान
बनाकर हाड़ मांस का पुतला
नर -नारी,
नचा रहा है
अपने इशारे पर
बांध कर सांसों की डोरी से
कर रहा उठा पटक
जिन्दगी का
कभी यहाँ
कभी वहॉँ
गिरा देता है
फिर उठा देता है
किसी की भी तकदीर
और बजाती है दुनिया
तालियाँ देखकर
एक दूसरे का खेल
कभी ठहाके लगाकर
जोर जोर से
और फिर
कभी
रो देती है वियोग में
जब चला जाता है
छोड़कर कोई कलाकार
मंच को छोड़कर
हमेशा के लिये
कभी मनाती है
खुशियां
नये कलाकार के
आने से
और यह क्रम
चलता रहता है
संचालक के एक
इशारे पर
नाचती रहती
कठपुतली (इंसान )
प्राणवंत होकर
रंगमंच के इस खेल में
जब तक संचालक
थामे रखता डोरी !
उसके बाद
तितर बितर हो जाता
उसका शरीर
मिट्टी में मिलकर
और फिर संचालक
चला जाता कहीं और
नयी कठपुतली
बनाने को
नया खेल दिखाने को !
