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Devendraa Kumar mishra

Abstract

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Devendraa Kumar mishra

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कोई बोले तो कुछ

कोई बोले तो कुछ

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बात थी ही नहीं 

बस यूँ ही कह दिया गया कुछ 

अब बात की खाल निकालने का कार्यक्रम 

शुरू हुआ 


बात को इतना खींचा गया, इतना ताना गया 

कि बात का बतंगड बन गया 

बात पर बहसें होने लगी 

पक्ष विपक्ष में बोलने लगे लोग 


कहाँ कुछ गया था, अर्थ कुछ निकाला गया 

मौन पर भी कहा गया कि मौन क्यों हैं 

जवाब क्यों नहीं देते 

जरूर कोई तो बात है और


लानतें तोहमतें मढ़ दी गई उस पर 

आज का विलेन वही था 

कल पता नहीं किसकी बारी है 

लगे तो हैं पीछे कि कोई बोले तो कुछ।


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