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Archana kochar Sugandha

Tragedy

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Archana kochar Sugandha

Tragedy

किताब

किताब

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लिखा था इसमें दर्द को 

पीड़ा में थरथराए पन्ने 

काश! कोई सीने से लगाकर

सहला देता इस दर्द को 

आवरण के सुकू-चैन में 

पन्नों को आराम मिल जाता ।


हीरे-जवाहरात के 

बेशकीमती शब्द मोती को 

अपने कंठहार में पिरोती 

इस किताब की दुनिया ने, 

अब अपने भीतर 

बेशुमार दर्द को समेटा है ।


न जाने इसे कौन से

ग्रहण ने लपेटा हैं 

किताब घरों में, 

ढ़ेर लगा हैं किताबों का 

पढ़ने वालों का हुआ, 

बड़ा टोटा हैं ।


दिल से पढ़कर 

इसे चक्षु विहार करवा देते ।

देश-दुनिया की सैर करवा देती 

आदि-अनादि काल का, 

सजदा करवा देती 

अजब-गजब रहस्य-रोमांच से, 

रू-ब-रू करवा देती 

प्रकृति जीवन आधार, 

कुदरत का अनमोल उपहार 

पर्व, पाणिग्रहण, 

रीति-रस्मों रिवाजों की मस्ती में, 

जीना सिखा देती।



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