किसान
किसान
किसान तेरी भी क्या तकदीर है
खुदा के फैसले पर तू भी मजबूर है
पैसा मेहनत और समय सब देख कर
तब उपजता फसल अपनी है
फ़िर कहर बन छा जाएँ बदरा
बोलो फिर किसका कसूर है....!!
खड़ा लाचार देखता वो सब कुछ है
पर बस में उसके ना होता अब कुछ है
मेहनत का फल अब उसको मिलता ना कुछ है
बेबस आंखों मैं झड़ते आंसू का मातम ही सब कुछ है
सारी आशाएं धरी रह गई हाथ ना आया अब कुछ है
समझ ना आए ख़ता हुई क्या कुछ है....!!
फसल के संग संग सपने भी देखें
पिता ने बच्चों के संग ना जाने क्या क्या कहते देखा
नई किताबें, नया हो वस्ता और फीस भी जमा होते हुए देखा
नए-नए कपड़ों संग सबने ख़ुद को सजते हुए देखा
कर्ज भी उतरेगा सर से यह भी एक सपना देखा
हो गए सब धराशाई सपने आज ऊपर जो काला बदरा को देखा....!!
