STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Tragedy

4  

Surendra kumar singh

Tragedy

ख़याल भर तो नही है

ख़याल भर तो नही है

1 min
352

ख़याल भर तो नही है

जहाँ खड़े हैं

वहाँ से जमीन का खिसकना

और ऊपर से आसमान का गिर जाना

रोने को तो बहुत है

पर अवसर कहाँ है


चुपचाप एकांत में बैठ

दो बूंद आंसू ढुलकाने का,

जमीन खिसकते ही

तो लटक गये हैं आसमान में

और जब आसमान गिरा

तो मिल गये आसमान में

और पैरों के नीचे से खिसकी धरती

डोलती हुयी तुम्हारे पास ही तो है।


बेचैन से तुम

सकपकाये हुये सकून की तलाश में

शुक्र है निराश नही हो तुम

और आसमान में लटकता हुआ मैं

आंखों से ढलकने को बेताब आंसू

अटके हुये थे भावों के पहाड़ के बीच आसमान में

और अब सड़कर

अमृत सा महकने लगे हैं

अब रोना भी कितनी जरूरी है

झरेंगे अमृत कण

आंसू की तरह

तुम्हारे प्रेम से आवेशित होकर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy