ख़याल भर तो नही है
ख़याल भर तो नही है
ख़याल भर तो नही है
जहाँ खड़े हैं
वहाँ से जमीन का खिसकना
और ऊपर से आसमान का गिर जाना
रोने को तो बहुत है
पर अवसर कहाँ है
चुपचाप एकांत में बैठ
दो बूंद आंसू ढुलकाने का,
जमीन खिसकते ही
तो लटक गये हैं आसमान में
और जब आसमान गिरा
तो मिल गये आसमान में
और पैरों के नीचे से खिसकी धरती
डोलती हुयी तुम्हारे पास ही तो है।
बेचैन से तुम
सकपकाये हुये सकून की तलाश में
शुक्र है निराश नही हो तुम
और आसमान में लटकता हुआ मैं
आंखों से ढलकने को बेताब आंसू
अटके हुये थे भावों के पहाड़ के बीच आसमान में
और अब सड़कर
अमृत सा महकने लगे हैं
अब रोना भी कितनी जरूरी है
झरेंगे अमृत कण
आंसू की तरह
तुम्हारे प्रेम से आवेशित होकर।
