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Suresh Koundal

Abstract Tragedy


4.5  

Suresh Koundal

Abstract Tragedy


क्रूर करोना

क्रूर करोना

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देखो कैसे दिन हैं आये,

संकट के बादल हैं छाए ।

चेहरे की रंगत उड़ी उड़ी,

सबके हृदय हैं घबराए ।।


कैसी है यह हवा चली ,

आम ज़िन्दगी बिखर गई।

रौद्र रूप लिए मृत्यु को देख,

हर एक ज़िन्दगी सिहर गई ।।


श्वास श्वास को तरसे दुनिया ,

हवा भी हीरों मोल बिक रही ।

जाने कैसा भस्मासुर आया,

अनगिनत चिताएं धधक रही ।।


रिश्ते नाते रह गए पीछे,

जान बचाने मुट्ठी भींचे ।

भागम भाग चली है कैसी,

भाग रहे हैं आंखें मीचे ।।


हुई बेबस दुनिया सारी,

मायूसी फैली छाई लाचारी ।

कोरोना ने कोहराम मचाया,

तड़प उठी है दुनिया सारी ।।


क्रूर कोरोना से लड़ना होगा,

नियमों का पालन करना होगा ।

वैक्सीन, मास्क और दो गज दूरी ,

भीड़ भाड़ से बचना होगा ।।


गर टूटेगी कोरोना श्रृंखला,

तभी धरा से मिटेगी ये बला ।

बात ये गांठ में बांध लो सारे ,

इसी में छुपा है सबका भला ।।



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