कभी वो दोबारा मिले
कभी वो दोबारा मिले
उसकी शख्सियत भी थी कुछ कोहरे जैसी
कभी वो साफ़ तो कभी वो धुंधले से दिखे
हो गई फना उम्र मेरी उनको समझने में ही
कभी वो अपने से थे तो कभी बेगाने से लगे
उलझाते रहे कुछ इस कदर अपनी बातों में
बन के पतंग रह गया क्यों उनके हाथों में
हरीक कहूँ या हाफ़िज़ कहूँ उनको अपना
कभी खुद ही ज़ख्म दिए कभी खुद ही सिए
हर मुलाकात पर मुझे अपनी ज़िंदगी बताते रहे
अपनों के बीच वो मुझ से ही कतराते रहे
खिल ही नहीं पाए फूल सूरजमुखी के दिल में
कभी उगे सुबह जैसे कभी वो शाम की तरह ढले
उलझे ही रह गए ताउम्र उनके और मेरे रिश्ते
ज़िंदगी चुकाती रही नाकाम इश्क़ की किश्ते
क्यों अंधेरा कर गए वो रोशनी की बात करके
मेरी राहों में जो थे कभी दिये की तरह जले
इबादत की तो सही मैंने उसकी बड़ी देर तक
मगर आरजू मेरी पहुंच ना पाई उसके घर तक
सच कहता हूँ मुँह फेर लूँगा मैं हँसते हँसते
गर किस्मत से मुझे जो कभी वो दोबारा मिले

