STORYMIRROR

Vivek Netan

Abstract

2  

Vivek Netan

Abstract

मेरी गजल रूठ गई

मेरी गजल रूठ गई

1 min
34

मेरे लफ्ज़ो में अब शायद बो बात ना रही

मेरी गजलों की किस्मत में बज्म ना रही


लफ्जो में जोर ना रहा या दर्द कम हो गया

दाद खूब मिली मगर अब बाहबाही ना रही


सब ढूढ़ने में लगे है अगल़ात मेरी गजल में

इस अंजुमन को अब मेरी इक़्तिज़ा ना रही


मौसम की तरह बदलती है इन्तिख़ाब यहाँ 

अब तो मेरी लिखने की इश्तियाक़ ना रही


ना क़ल्ब को ना कलम को सकून मिलता है

यहां ख़ामो में ख़ालिश की कोई क़दर ना रही


अब क्या फायदा सुना कर तुझे अपनी ज़ह्मत

जब मेरे कद्रदानों को मेरी जुस्तजू ही ना रही!


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract