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Phool Singh

Tragedy Others

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Phool Singh

Tragedy Others

कैसी विपदा

कैसी विपदा

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सुनसान सड़क, सुनसान रात है, सुनसान सबके अन्तर्मन 

कैसी विपदा आन पड़ी ये, दुःख, तड़प और है उलझन।।


चिराग बुझ रहे हर पल, हर क्षण, लगा दो चाहे तन, मन, धन 

कड़ा समाधान न मिला अभी तक, जकड़ रहा है गहरा तम।।


भूख, प्यास और खाली है घर, रोजी रोटी भी हो गई बंद 

वायु में जैसे विष घुला है, कैसा संकट ये कैसा कष्ट।।


हर पीड़ित अब यही पूछता, भूख लगने पर हो बंधन 

पापी-खाली पेट तो मान रहा न, कैसे इच्छापूर्ति करेगा रंक।।


हाथ पसारे मांग न सकते, खोने आत्म-सम्मान होता डर  

मदद करे भी तो कैसे करें, विचलित है आज हर एक मन।।


दया, करुणा छिप कर बैठी, मानवता गई जैसे मर  

मदद करे या खुद को बचाए, करे, दूसरों की चिंता कैसे फिक्र।।


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