।। काव्य ।।
।। काव्य ।।
वो शब्दों के निपट खिलाड़ी,
मैं बस भावनाओं में भटका था,
ग्रंथ लिख चुके वो अब तक कितने,
मैं बस मुखड़े पर अटका था ।
वो तो हैं खुद जीवित शब्द कोष,
शब्द झराझर झरते हैं,
हम भावनाओं के वशीभूत,
बस शब्द चयन में डरते हैं ।
मात्रा, नुक्ता और भार ज्ञान में,
वो बस ऐसे पारंगत हैं ,
दोहा, सोरठा या हो फिर मुक्तक,
हर महफिल उन की संगत है।
मन उलझा अपना भी एक दिन,
सोचा तुम क्यों ना कर पाते हो,
बस दिल से दिल की लिखते हो,
और इतने पर इतराते हो।
शायद तुम में नहीं विद्वता,
या फिर कुछ सीखो ये चाह नहीं,
तुम यूँ ही उथले में बैठे हो,
कुछ गहरा जाने की चाह नहीं,
रे मन, हम भी तब बोले मन से,
कविता बंधन का नाम नहीं,
ये तो अल्हड़ नदिया सी है बस,
बहती चलती विश्राम नहीं ,
जब शब्द पिरो कर बंधन में,
बस काग़ज़ पे उकेरा जाता है,
वो पद्य तो लिखता छपता है,
पर काव्य नहीं बन पाता है।
तू लिख वो ही जो मन को जंचे,
दिल से निकले और दिल में बसे,
लेखनी तेरी बस सविता हो,
जन जन को छुए वो कविता हो,
उद्देश्य तेरा बस शब्द नहीं हैं,
पर शब्दों को ध्वनि दे जाना है,
कविता शकुंतला सी व्यथित खड़ी,
बन कालीदास रिझाना है,
बन कालिदास रिझाना है।।
ये कविता एक कवि का खुद से संवाद है और अंतर्मन में चल रहे द्वंद्व को दर्शाता है। आशा है आप खुद को जोड़ पायेंगे।।
