काल
काल
काल के इस रथ पर
जीत हुई है सदा ही
उद्वेग की, अविवेक की !!!
सोचा है जिसने भी
एक पल ठहर कर..
वो न कर पाया खुद को मुक्त
विवेक की बेड़ियों से..
ड़ाल दिए बंधन मर्यादा ने !!!
और वो कर बैठा समर्पण
काल के आगे.......!!!
