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Rekha Joshi

Tragedy

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Rekha Joshi

Tragedy

जो न समझे दर्द उसको आदमी कैसे कहूँ

जो न समझे दर्द उसको आदमी कैसे कहूँ

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जो न समझे दर्द उसको आदमी कैसे कहूँ 

जी सके हम जो नही वह ज़िंदगी कैसे कहूँ …… 

आसमाँ पर चाँद निकला हर तरफ बिखरी किरण 

जो न उतरे घर हमारे चाँदनी  कैसे कहूँ ...... 

मुस्कुराती हर अदा तेरी सनम जीने न दे 

हाल अपने की हमारे बेबसी कैसे कहूँ …… 

राह मिल कर हम चले थे ज़िंदगी भर के लिये

 मिल सके जो तुम न हम को वह कमी कैसे कहूँ …… 

हो गया रोशन जहाँ जब प्यार मिलता है यहाँ 

जो न आई घर हमारे रौशनी कैसे कहूँ ।



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