STORYMIRROR

Supriya Devkar

Tragedy

4  

Supriya Devkar

Tragedy

जख्म

जख्म

1 min
224

जख्म देकर पूछते हो 

दर्द हो रहा है क्या 

वजह तो बताओ जरा 

इतने मजबूर थे क्या 


किस्मत से मिले थे हम

किये थे साथ निभाने के वादे

कहाँ छोड़ आये वो पल 

भूल गये क्या सारे वादे


ठोकर लगने का गम नही

पर भरोसा टूट गया

दिल मे बसा हुआ प्यार 

जाने कहाँ छूट गया 


अब सोचकर डर लगता है 

कैसे करें यकीन किसी पर

महाभारत तो होता रहेगा 

कब तक जिए धृतराष्ट्र बनकर।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy