STORYMIRROR

Supriya Devkar

Tragedy

3  

Supriya Devkar

Tragedy

अनचाहे स्पर्श

अनचाहे स्पर्श

1 min
172

मै नहीं हूं मूर्त सोने की

मेरे पास है मेरा निर्मल मन

क्यों करते हो अन चाहे स्पर्श

मुझे आती है उनकी घिन


कब तक है ये सहना मैने

क्या मकसद है मेरी जिंदगी का

नारी नहीं खिलोना कोई

क्या अधिकार नही उसे जीने का


क्यों होती हूं शिकार हवस का

मन मे है कितना आतंक

देते हो घाव ऐसा

लग जाता माथे पे कलंक।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy