STORYMIRROR

Dr.Rashmi Khare"neer"

Abstract

4  

Dr.Rashmi Khare"neer"

Abstract

जिंदगी

जिंदगी

1 min
306

मै थामती चली जा रही हूं

और

मेरी जिंदगी

अंजुली भरे रेत की तरह

धीरे धीरे झरती चली जा रही


और

थामती चली जाती जिंदगी में

घोसले बनाती बया

और

घोसले खाली होते

जिंदगी लंबे लंबे कद भर भर कर

बढ़ती चली जा रही


और बढ़ती चली जाती जिंदगी में

मृगतृष्णा का आभास है

निस्तब्ध धुंधली आकृति

मै उसे मिटाना चाहती हूं


मै थामना चाहती हूं

पलाश बन जीना चाहती हूं

बसंत में बसंती रंग में ढलना चाहती हूं

ढल जाना चाहती हूं

अपनी मानसिकता में

जीना चाहती हूं खुलकर जीना


ಈ ವಿಷಯವನ್ನು ರೇಟ್ ಮಾಡಿ
ಲಾಗ್ ಇನ್ ಮಾಡಿ

Similar hindi poem from Abstract