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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

"जाने कैसा दौर"

"जाने कैसा दौर"

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जाने किस दौर से गुजर रहा है,यह वक्त मेरा

आईना ही छल रहा है,अब तो यह बिम्ब मेरा

सबको मैंने अपना माना था,इस दुनिया मे,

आज उन्ही उन्ही से जल रहा है,दामन मेरा


दुनिया मे अब कोई भी नही बचा है,सगा मेरा

सब जगह है,बस दुनिया मे अंधेरा ही अंधेरा

उजाले पर आजकल ऐसा हुआ तम का फेरा

दीपक भी दे रहा,आजकल अंधेरा ही अंधेरा


हर रिश्ते से यहां मन भर गया है,अब मेरा

हर रिश्ते से निकला बस स्वार्थ भरा चेहरा

किसी भी रिश्ते से नही निकला है,यहां सवेरा

फिर भी में तो साहिल हूं,जग दरिया से गहरा


हर तूफां से टकराउंगा,गिरी खंड जो ठहरा

केवल पथिक नही,मंजिल का हूं,मैं वो चेहरा

जो अमावस को भी करता है,पूनम सेहरा

क्योंकि मेरे घट में छिपा है,सत्य नाम गहरा।



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