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parag mehta

Classics

5.0  

parag mehta

Classics

इस पल

इस पल

1 min
230


वाक़िफ इस ज़माने की हकीक़त से

धुएं के शोर और अजनबी सन्नाटों से

बेपरवाह अनजाने अंजामों से

मैं तो इस पल को जी कर ही खुश हूं।


किसी और याद के आ जाने से

कुछ थोड़ा थोड़ा भूल जाने से

कुछ और मालूम हो जाने से

मैं तो इस पल में खो कर ही खुश हूं।


ज़िन्दगी के अपने खेलों से

दिलों के अपने मेलों से

दौड़ती भागती रेलों से

मैं तो इस पल में रुक कर ही खुश हूं।


आलीशान से दिखते मकानों में

नए नए आशियानों में

और ना जाने कितने फसानों में

मैं तो इस पल में रह कर ही खुश हूं।


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