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parag mehta

Abstract


5.0  

parag mehta

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मैं

मैं

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ये बात है एक द्वंद्व की !

उसके साथ जुड़े विध्वंस की !


सवाल तो वो एक ही है !

जवाब जिसका "मैं" ही है !


आखिर श्रेष्ठ है कौन ?

इसके उत्तर में कोई ना मौन !


सब कहते खुद ही को श्रेष्ठ !

कोई ना लगता खुद से ज्येष्ठ !


ये तो है एक ऐसी जंग !

फीके से लगते जिसके आगे सब रंग !


पर बात करता हूँ एक पते की !

यह तो असल में है एक फिरकी !


जब मान ले हर इंसान !

कि "मैं" तो नहीं महान !


ना मैं श्रेष्ठ , ना तू श्रेष्ठ !

सिर्फ एक है जो सर्वश्रेष्ठ !!


ज़ोर तो बस उसका ही चलेगा !

ना उससे कोई जीता , ना ही जीतेगा !



कोई भी नीचा ना है मुझसे !

जाना जिसने ये , वो खुश सबसे !


गवाही देता है यह इतिहास भी !

जंग जब भी हुई है श्रेष्ठता की !


किसी को भी ना मिल सकी विजय !

सभी के हाथ आई सिर्फ पराजय !


तो दायित्व है यह सबका !

नाम ना आने पाए अब जंग का !


और उसे साधना है अगर !

बिना किसी डर और कोई फिक्र !


तो फिर उठे जब भी ये द्वंद्व !

कि आखिर कौन है सबसे श्रेष्ठ !


सदा लबों पे आये एक ही जवाब !

"मैं" तो श्रेष्ठ नहीं हूँ जनाब !


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