ह्रदय की लेखनी
ह्रदय की लेखनी
हृदय की लेखनी से अपने दिल का हाल लिखता हूँ,
तेरे ही नाम से जीवन का मैं हर एक साल लिखता हूँ।
कभी तन्हाई में जब आँख से आँसू छलकत जाते हैं,
उन कतरों में भी मैं अपना सुहाना कल लिखता हूँ।
तेरी इक मधुर मुस्कान पर वार दूँ दोनों जहाँ अपने,
तेरी सादगी को ही मैं ज़माने में कमाल लिखता हूँ।
इस ज़माने की जफ़ाओं से कभी भी मैं नहीं डरता,
अपने हौसलों से मैं जीत की मिसाल लिखता हूँ।
ज़माने में ये पाकीज़ा मोहब्बत ही एक हक़ीक़त है,
इस उल्फ़त को मै अपने दिल से इकबाल लिखता हूँ।
'मुरली' तेरे ही ज़िक्र से सजाता हूँ मैं इश़्क की ग़ज़ल,
तेरी यादों को ही कलम से मैं अपनी ढाल लिखता हूंँ।
रचना:-धनजीभाई गढिया"मुरली" (ज़ूनागढ-गुजरात)

