हमारी रूह
हमारी रूह
जब पैदा हुआ,
थोड़ा समझने लगा,
हिंदी को ही,
देखा और भाला,
हमारे घर के,
कण कण में ही,
हिन्दी रची और बसी है,
मां बाप इसे बोलते थे,
भाई बहन इसे बोलते हैं,
पड़ोसी इसी में,
विचरते हैं,
जहां जाते हैं,
हिंदी ही पाते हैं,
ये हमारी रूह में सम्मिलित हो गई।
मुझे हमेशा लगा,
जैसे दुसरी मां हो,
एक ने तो जन्म दिया,
परंतु दुसरी ने,
वार्तालाप का परामर्श दिया,
कभी निराश नहीं किया,
जहां भी गया,
अगर हिंदी से संबोधित किया,
तो हाथोंहाथ लिया,
अपना भाई बंधू समझा,
बहुत अपनत्व दिया,
बल्कि अपनी रूह में स्थान दिया।
अब तो ये,
बाहर भी बहुत प्रचलित,
तकरीबन सारे विश्वविद्यालयों में,
पढ़ाई जाती,
हर बिषय इसमें उपलब्ध,
हर जगह नेतृत्व करती,
जब से भारत की,
आर्थिकी हुई संपन्न,
जो विदेशी भी आता,
उसको मालूम,
भारत में हिंदी के बिना,
काम दुर्लभ हो जाता,
इसलिए हिंदी में निपुणता हासिल करता,
फिर हमारी ओर रूख करता।
आज की पीढ़ी भी व्यावहारिक,
सब हिंदी सिखते बोलते,
नये से नये प्रयोग करते,
दुसरी भाषाओं का भी,
हिंदी में अनुवाद करते,
और फिर पढ़ते,
प्रोत्साहित होते,
बाकि प्रदेशों में भी,
हिंदी का चलन जोर पकड़ रहा,
हर इलैक्ट्रोनिक गैजेट भी,
हिंदी में मिल रहा,
अब हिंदी को सौतेला,
नहीं हम कह सकते,
इसका मान सम्मान बढ़ रहा,
हर गली कुचे में,
इसका झंडा बुलंद हो रहा,
कोई ऐसी प्रतियोगिता,
देश में नहीं,
जो हिंदी में न होती हो,
जिसकी तैयारी की किताबें,
हिंदी में न मिलती हो।
आज इंटरनेट की दुनिया,
सारी दुनिया में,
भाषा प्रवाह जोर शोर से,
हिंदी भी नहीं पीछे,
जो चाहे मैसेज टाइप करो,
हिंदी में,
जहां मर्जी भेज दो,
जिस मर्जी भाषा का अनुवाद,
हिंदी में तुरंत गुगल द्वारा कर लो,
तो हिंदी अब,
बनने जा रही है,
सारे विश्व की भाषा,
वो दिन दूर नहीं,
जब बनेगी,
हमारी राष्ट्र भाषा,
हम सम्मान से कह पाएंगे,
हम हिंदी वाले हैं।
