हिमालय का रूदन
हिमालय का रूदन
आज हिमालय रो रहा,
टूट-टूट कर अश्रु बहा रहा।
गंभीर शांत हिमालय हो गया बेचैन,
अब नित अश्रु बहाते हैं उसके व्याकुल नैन।।
आँसुओं में दिखा रहा वह अपना क्रोध,
अभी तक नहीं है, हमें इसका बोध।
दिखा चुका थर-थरा कर कई कम्पन,
हो रहे हैं अब इससे नित कई भूस्खलन।।
इतना रो लिया हिमालय हिम-सरिताएँ मचल गई।
छोड़ अपनी सीमाओं को जमीं पर उमड़ गई।
आँसुओं ने मचा दी अब तबाही,
इनसे कैसे धरती जाएगी बचाई।।
बहुत स्वार्थी बन गया अब मानव,
हरियाली खत्म करने लगा बनके दानव।
सड़कें बनी, भवन बने, धरती को काट-काट कर,
जंगल जले, पेड़ जले, हो गई हरियाली बंजर।।
बढ़ गया हिमालय का ताप, धरती हमारी गर्म हुई,
विलुप्त हुए प्राणी, जैव विविधता प्रभावित हुई।
हमें ही कम करना होगा, अब बढ़ता प्रदूषण,
लेने होंगे ठोस कदम रोकने हिमालय का रुदन।।
