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Ram Chandar Azad

Romance

4  

Ram Chandar Azad

Romance

हे सखि...!

हे सखि...!

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हे सखि! रूठि गये पिय मोरे।।


कसिक मनाऊँ मानत नाहीं, जो कल तक थे भोरे।।


सुबह मनाऊँ, शाम मनाऊँ, विनति करूँ कर जोरे।।


जब जब बात करन को चाहूँ, लखत न मेरी ओरे।।


जस अजनबी बात करे कोई, वैसे भये पिय मोरे।।


सब सपने अब जलत दीखते, जो हिय रह्यौ बटोरे।।


हे 'आज़ाद' बस्यौ पिय हिय में, तडपावत मन मोरे।।


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