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Dr. Anu Somayajula

Abstract

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Dr. Anu Somayajula

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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रात का गुज़रना ही काफ़ी है

सुब्ह का निकलना ही काफ़ी है।


अंधेरों के सायों का डर न हो

जुगनुओं की चमक ही काफ़ी है।


चराग़ न जले कोई बात नहीं

चराग़ों की बात ही काफ़ी है।


रोशनी रहे  न रहे राहों  में

धुएं का साथ ही  काफ़ी है।


जिन्नात को किसने देखा है

जिन्नात का ज़िक्र ही काफ़ी है।


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