ग़ज़ल
ग़ज़ल
रात का गुज़रना ही काफ़ी है
सुब्ह का निकलना ही काफ़ी है।
अंधेरों के सायों का डर न हो
जुगनुओं की चमक ही काफ़ी है।
चराग़ न जले कोई बात नहीं
चराग़ों की बात ही काफ़ी है।
रोशनी रहे न रहे राहों में
धुएं का साथ ही काफ़ी है।
जिन्नात को किसने देखा है
जिन्नात का ज़िक्र ही काफ़ी है।
