ग़ज़ल
ग़ज़ल
ख़िज़ाँ में दरख़्तों के पत्तों सा दर्द सहने लगा था मैं,
अपने गांव की मिट्टी छोड़ शहर में रहने लगा था मैं।
वो चार पैसे कमाने क्या आया था मैं,
अपने ही घर में मेहमान सा रहने लगा था मैं।
वतन की हवाएं ना जाने कैसी होंगी,
इन्हीं ख़यालों में गुमसुम सा अब रहने लगा था मैं।
बेख़याली में ही ना जाने हर्फ़ जुड़े जो,
आजकल ग़ज़ल सा कुछ कहने लगा था मैं।
- योगेश कानवा
