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Yogesh Kanava

Abstract Classics

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Yogesh Kanava

Abstract Classics

कोई फरिश्ता लगता है

कोई फरिश्ता लगता है

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मेरी हालत देखकर परेशान वो होने लगता है,

मुझे तो पिछले जनम का कोई रिश्ता  लगता है।  

फ़क़ीरों  की सी वो तो जाने क्यों बातें करता है ,

अपने जूनून में तो वो कोई फरिश्ता लगता है। 

जब  हमने भी उसे आज़माने की कोशिश की,

वो तो हमारा ही कोई वक़्त गुज़स्तान लगता है।

पहलु में बैठकर कहने लगा आहिस्ता आहिस्ता ,

आज उसकी आँखों से सावन बरसता लगता है। 


- योगेश कानवा   

 


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