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Yogesh Kanava

Others

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Yogesh Kanava

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खिला रूप कचनार सा

खिला रूप कचनार सा

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ओ मन मोहिनी, रूप खिला है ऐसा अब इस बार का,

वो कामिनी, नयन-दामिनी, खिला रूप गुलनार सा  ।

चमक जाए जैसे फूल खिले, उपवन में कचनार का,

रूप देखकर चंद्रमा भी, मान करे श्रृंगार का।


स्वर्णिम आभा दमक रही है, मुखमंडल के द्वार पर,

जैसे उषा उतर आई हो, धरा के इस संसार पर।

अधर-सुधा की मधुर मुस्कान, मानो कलिका गुलाब की,

छवि ऐसी, जैसे पूर्णिमा में छटा खिले महताब की।


नयन तुम्हारे नयन नहीं हैं, मदिर-मोह के प्याले हैं,

जिनमें डूब सुध-बुध खो बैठें, कितने हृदय मतवाले हैं।

पलकों की चितवन में जैसे, तीर छिपे मनुहार के,

एक झलक पर हार मान लें, रंग सभी संसार के।


केश घटा-से लहराते हैं, मुख पर छाया निखार है,

अंग-अंग में लावण्य भरा, रूप अनुपम अपार है।

प्रकृति स्वयं भी ठहर निहारे, ऐसी छवि सरकार की,

जैसे रचना पूर्ण हुई हो, विधि के श्रेष्ठ विचार की।


कचनारों की कोमल कलियाँ, तुमसे शोभा पाती हैं,

चाँद-सितारों की सुंदरता, तुमसे लाज छिपाती है।

फूलों की रंगत फीकी पड़ती, देख छटा मुखार की,

तुम प्रतिमा हो रूप-सुधा की, अनुपम शिल्पकार की।


चाल में गरिमा, दृष्टि में दृढ़ता, मुख पर तेज अपार,

आत्मविश्वास से दमक रहा है, व्यक्तित्व का संसार।

झुकती नहीं समय के सम्मुख, साहस की प्रतिमूर्ति,

स्वयं भाग्य लिखने वाली, संकल्पों की स्फूर्ति।


नयनों में बिजली की चमक, अधरों पर मुस्कान,

अपने होने का गर्व निराला, अपनी अलग पहचान।

रूप-सुधा के साथ मिला है, साहस का उपहार,

ऐसी नारी के सम्मुख फीका, लगता हर शृंगार।


लेकिन केवल रूप नहीं है, तुम आकर्षण की खान,

तुझसे ही से खिल उठता, हर महफिल का मान।

तुम जहाँ रहो, वहाँ बहारें, अपना डेरा डालें,

तुम्हारी हँसी के आगे, ग़म भी राह बदल डालें।


स्वर्णिम आभा दमक रही , मुखमंडल के द्वार पर,

जैसे उषा उतर आई हो, धरा के इस संसार पर।

अधर-सुधा मधुर मुस्कान, मानो कलिका गुलाब की,

छवि ऐसी, जैसे पूर्णिमा में छटा खिले महताब की।


चाँद गगन में दमक रहा हो, तुम धरा की शान,

आत्मविश्वास तुम्हारा ही है, तुममें बसी पहचान।

रूप तुम्हारा फूल कचनार, व्यक्तित्व प्रखर अंगार,

तुम-सी नारी पर स्वयं प्रकृति करती नाज अपार।



योगेश कानवा


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