ग़ज़ल
ग़ज़ल
यहाँ रजतपथ सब धूल बन जायेंगे,
फूल भी दूंगा तो वो शूल बन जायेंगे।
मैं जनता हूँ वक़्त ज़ालिम है बहुत,
किनारे भी ये मझधार बन जायेंगे।
वक़्त दुश्वार सही न पतवार सही ,
मेरे हाथ ही ये पतवार बन जायेंगे।
कमी नहीं है नाख़ुदाओं की यहाँ ,
हौसले ये खुद ऐतबार बन जायेंगे।
लगेगी सफ़ीना साहिल पर ज़रूर ,
ख़िज़ाँ के दरख़्त बहार बन जायेंगे।
पछताओगे तुम एक दिन ज़रूर ,
फूल अपने ही वो ख़ार बन जायेंगे।
- योगेश कानवा
