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Yogesh Kanava

Abstract

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Yogesh Kanava

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तुम वही हो ना जनपद कल्याणी

तुम वही हो ना जनपद कल्याणी

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जो संवर के निकले हो 

तुम आज बेहिजाब 

लो ख़यालों में मेरे 

आ गई वैशाली की वो 

जनपद कल्याणी 

हाँ वही आम्रपाली ,

युगों युगों से जिसे 

तलाशता रहा मैं। 

कभी मयख़ानों में 

कभी मीनाबाज़ारों में ,

कभी बुत -ओ -दैर  तहख़ानों में 

पर तुम नहीं मिली ,

आज अचानक यूँ 

कहाँ से आ गयी तुम 

यूँ बन संवर कर 

तुम वही हो ना जनपद कल्याणी

पर 

ये समझो 

अब ना वो वैशाली है 

ना वो मीना बाज़ार

बस मैं हूँ 

तुम हो ,वहीँ के वहीँ 

लोग वो नहीं रहे 

अब आँखों में भी 

उग आये हैं नाखून लोगों के 

जो उधेड़ देते हैं 

चमड़ी तक भी 

कपड़ों फिर बात ही क्या है।  



- योगेश कानवा  


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