गज़ल
गज़ल
देखा एक रोज तुझे किसी गैर के साथ
तो दिल ने कहा वो बदल गया है
पर जब उसके साथ भी द़गा कर गया तू
तो मालूम हुआ तू बदला नहीं बेनकाब हुआ था।
आज दिल से हार मान
तुझ संग गुजरे लम्हों को याद किया
तो कुछ यूँ लगा
मानो जन्नत की सेर कर ली।
यार यकीन ही नहीं होता दिल को
कि तू वही है जिसे हमने कभी खुदा माना था।
बडा़ तरस आता है मुझे डायरी के उन पन्नों पर
जो आज भी तेरी झूठी व़फाओं से सजे हैं।
काश तेरी यादें भी तेरे नम्बर की तरह होती
ताकि ब्रेक अप होते ही ब्लोक कर देते।
अगर बैठो कभी मस्जिद की उन सीढियों पर
और यूँ ही उतर जाऊँ मैं तेरी यादों में
तो एक अहसान इस काफिर पर भी करना
कि तुम्हें भुला दूँ।
ये मन्नत कईं दफा ठुकरा दी मेरे रब ने
हो सके तो ये दुआ तुम अपने खुदा से करना।

