घूँघट की ओट
घूँघट की ओट
छबीली गौरी जरा खोल झीने घूंघट का छोर ,
तेरे चाँद सलोने मुखड़े से मन होने दे बिभोर!
तोरे माथे पर बोर सुनहरी सोहे नयनाभिराम,
ललाट कस्तूरी तिलक राजत रतनार ललाम!
चन्द मुलाकात चुपके से उल्फ़त बन गयी,
ये दिल्लगी जिन्दगी का अफ़साना बन गयी !
दिल का चिराग जलाओ बहुत अंधेरा हो रहा,
सजनी लौट आवो दिल मिलन को मचल रहा!
करवट बदल रात कटी नींद न आयी आंखों में,
तेरी यादों ने उलझाये रखा मीठी मीठी बातों में !
तुमने जब होंठो से छुआ मेरी भींगी पलकों को,
रात भर सुलगती रही ख्वाबों में आलिंगन को !
हर पल तुझसे मिलन की बेताब आस रही,
निसदिन ख्वाबो में मिलन प्यास बुझती रही!

