ग़ज़ल
ग़ज़ल
अफ़वाह है या हक़ीक़त पहचान भी नहीं है
आंखें चलो हैं फूटी क्या कान भी नहीं है
चिथड़ों को देखकर दिल जिसका नहीं पसीजे
जिसमें दया नहीं वो इंसान भी नहीं है
ये कब्र खुद रही है इंसानियत की कैसी
है दफ़्न दिल में दिल पर श्मशान भी नहीं है
उसमें हूँ जबसे उलझा,सुलझा सा लग रहा हूँ
मुश्किल भी वो नहीं है आसान भी नहीं है
सम्मान जो बड़ों का करना न जाने वैभव
अपना भी वो नहीं है महमान भी नहीं है।
