ग़ज़ल - जुदाई
ग़ज़ल - जुदाई
ख़ुद ही ख़ुद की खुशियाँ लुटाना नहीं अच्छा।
इस तरह दस्तूर-ए-दुनिया निभाना नहीं अच्छा।
सुना है की बहुत उदास रहते हो आजकल।
खुद अलग हो अब आँसू बहाना नहीं अच्छा।
नीश-ए-फ़िराक़ से घायल है मेरी रूह तक।
दिल-ए-सोज़ाँ को और सताना नहीं अच्छा।
जुदाई चाहिए थी तो सीधे से माँग लेते हमसे।
किसी रिश्ते का तमाशा बनाना नहीं अच्छा।
हम भी थे बड़े काबिल इश्क़ होने से पहले।
नाकामी का यूँ मजाक उड़ाना नहीं अच्छा।
छोड़ के जाना ही था तो चले जाते एक बार।
बार बार जिंदगी में आ के जाना नहीं अच्छा।
जिंदगी भर तज़्लील तेरी सह के अब सोया हूँ।
कब्र पे रो के अब यूँ शोर मचाना नहीं अच्छा।

