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Vivek Agarwal

Inspirational

4  

Vivek Agarwal

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प्रतिशोध

प्रतिशोध

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4


चलो फिर याद करते हैं कहानी उन जवानों की।

बने आँसू के दरिया जो, लहू के उन निशानों की॥


महीना फ़रवरी का था, जगह कश्मीर घाटी थी।

अनेकों युद्ध की साक्षी, बड़ी पावन वो माटी थी॥


चला जाता था इक दस्ता, मचा था बस में हंगामा।

गुज़रता कारवाँ निकला, पड़ा रस्ते में पुलवामा॥


वहीँ था एक आतंकी, गुज़रता था जहाँ लश्कर।

लगा कर घात बैठा था, कि मिल जाये कोई अवसर॥


किया धोखे भरा हमला, बड़ा आतंक छाया था।

हुआ ग़मगीं वतन सारा, बहुत गुस्सा भी आया था॥


सहन करने की सीमा है, समय प्रतिशोध का आया।

सभी हमलों के पीछे जब, पडोसी मुल्क को पाया॥


गगन में उड़ चली फिर तो, विमानों की बड़ी टोली।

दिवाली सी जला आतिश, मनाई खून की होली॥


बमों की गूँज से धरती, दहलती थी दहकती थी।

उड़े चिथड़े हवाओं में, फ़ज़ा सारी धधकती थी॥


कि बालाकोट हमले से, पड़ोसी मुल्क घबराया।

रुका आतंक भारत में, अमन परचम था लहराया॥


क्षमा शोभा तभी देती, हो जब प्रतिशोध की क्षमता।

पराक्रम हो भुजाओं में, लहू दुश्मन का जब जमता॥


नमन चालीस वीरों को, यही संकल्प अपना है।

बचे कोई न आतंकी, यही हम सब का सपना है॥


कि चौदह फरवरी का दिन, समर्पित उन को कर देना।

सुमन श्रद्धा के वीरों को, चढ़ा कर याद कर लेना॥


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