STORYMIRROR

GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Tragedy

4  

GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Tragedy

फ़िर भी मैं पराई हूँ

फ़िर भी मैं पराई हूँ

1 min
430

जन्म से लेकर जवानी तक 

मैं पुरुष की तुलना में आई हूँ 

मैं खुद को जितना साबित करूँ 

मैं फ़िर भी पराई हूँ 


बिन शर्तो के ब्याही गई 

अपना घर छोड़कर 

अंजान घर बसाई गई 

मोल-भाव तौलकर 


घर लौटकर भी 

जितना तुम्हे संवारु 

फ़िर भी मै पराई हूँ 


ससुराल हो या मायका 

कहने को सब अपने है 

बात मेरी आती है तो

मैं पराई हूँ 


सभी के सपने सपने है 

मेरे सपने, सपने नही 

सबका ख्याल मेरी जिम्मेदारी 

फ़िर भी मैं पराई हूँ 


कभी बेटी बनकर 

कभी पत्नी तो कभी 

माँ बनकर, सबको अपना माना 

फ़िर भी मैं पराई हूँ 


जवानी छोड़ बुढापा आया

फिक्र का मुझे है अन्दाजा 


बच्चे मन के सच्चे 

बच्चो को जितना मिलता प्यार

मेरे लिये आधा भी नहीं रह जाता 

हर बात पर टोका-टाकी 

फ़िर भी मैं पराई हूँ 


जैसा तुम कहते हो 

वैसा मैं करती हूँ 

फ़िर भी मैं पराई हूँ 


जैसा तुम कहते हो 

वैसा मैं करती हूँ 

फ़िर भी मैं पराई हूँ 

फ़िर भी मैं पराई हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy