STORYMIRROR

GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Tragedy Fantasy

4  

GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Tragedy Fantasy

रोटी-कपड़ा

रोटी-कपड़ा

1 min
254


किसी ने हल चलाया 

किसी ने दुकान चलाई


दो पैसे कमाने के लिए 

कितनों ने जी जान लगाई


पसीना पसीना बहाकर 

दो रोटी घर में बनती है 


मेहनत और मजदूरी कर

घर की गाड़ी चलती है 


दो पैसे कमाए हुए हो 

तो कपड़ा तन पर आएगा 


जो छोड़ दोगे मेहनत का साथ

कौन भला तुम्हें खिलाएगा 


कमाना भी कहां इतना आसान

रोटी कपड़ा खुद की मेहनत है


जिंदगी संघर्ष के साथ है 

खाना पीना सब हैरत है 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy