“एक शहज़ादी की उड़ान”
“एक शहज़ादी की उड़ान”
एक शहज़ादी, एक परी, एक मन्नत—
क्या कहूँ मैं उसके लिए।
वह रहती थी एक सुंदर, अनोखी-सी नगरी में,
जहाँ न दुःख का कोई बसेरा था,
न मायूसी की कोई निशानी।
हर घड़ी उसकी आँखें चमकती थीं,
हर पल खुशियों की वर्षा होती थी।
यूँ ही एक दिन एक महावैरागी ने उसे बुलाया,
और बिन सोचे उसे धरती पर भेज दिया।
न एक बार पूछा,
न एक पल को सोचा।
उड़ते रंग बिखेरती हुई,
हसीन महलों को छोड़ वह चली आई।
स्वप्न था उसका—
एक शहज़ादा खोजने का,
और कुछ महान कर दिखाने का,
जो प्रेम से उसके पंखों में
नई उमंग भर दे।
पर मिला केवल छल,
एक निर्दयी, क्रूर पशु।
जीते-जी उसके स्वप्नों को
निचोड़ दिया गया।
कोमल सपनों को चीर कर
चेहरे पर तेज़ाब-सा सत्य फेंक दिया गया।
बिखर गईं सारी आशाएँ,
रक्त से उसके पंख तपने लगे।
हँसी–मज़ाक का पात्र बन गई वह,
अपराध न किया—
फिर भी दंड मिल गया।
न किसी को दुःख दिया,
फिर भी आँसुओं की धारा बहती रही।
साथ सभी ने छोड़ दिया—
जिसने भेजा, जिसने थामा,
सबने उसकी पुकार अनसुनी कर दी।
हृदय पर घाव थे,
पर मरहम कहीं नहीं।
अकेली, असहाय,
भूख–प्यास से दूर,
सबने यही सोचा—
वह गिर जाएगी, टूट जाएगी।
पर एक दिन चमत्कार हुआ।
परवरदिगार का संदेश आया—
“जहाँ डमरूधारी का आशीर्वाद हो,
वहाँ कोई कैसे निस्सहाय हो सकता है?”
डगमगाया उसका साहस,
पर वह अपने ही बल पर खड़ी हो गई।
आत्मनिर्भर बनने का
उसने दृढ़ संकल्प लिया।
कदम छोटे थे,
पर वह अग्नि-पथ पर चलती गई।
न डरी, न झुकी—
स्वयं को संभालती,
स्वयं को साहस देती रही।
हर क्षण परीक्षा बना,
हर दिन युद्धभूमि।
वह अकेली ही डटी रही,
हर कठिनाई से लड़ी,
और विजय प्राप्त करती गई।
जिस आँगन ने उसे पीड़ा दी थी,
वहीं उसने अपना कौशल दिखाया।
धीरे-धीरे
उसके पंख फिर उग आए।
विश्वास उसकी शक्ति बना,
और लक्ष्य की ओर
उसने ऊँची उड़ान भरी।
सब दंग रह गए—
उड़ती हुई उस परी को देखकर।
आँधियाँ, तूफ़ान, तीखी धूप—
कोई उसे रोक न सका।
जिन्होंने साथ छोड़ा था,
वे आज भिखारी बनकर आए,
करुणा की एक झलक के लिए।
पर अब उसने ठान लिया था—
न वह किसी के लिए झुकेगी,
न किसी के लिए रुकेगी।
उसने स्वयं में ही
प्रेम को पा लिया था।
अब चाहने वाले तरसते हैं,
एक किरण भर के लिए।
वह एक ऊर्जा है,
वह एक अनोखी बहार है।
वह एक परी ही काफ़ी है—
हर सुबह के लिए,
हर निशा के लिए।
