दोपहर का वक़्त और वो
दोपहर का वक़्त और वो
दोपहर का वक़्त और वो
जाने जमीन पर कोई आईने का टुकड़ा रखा हो
मेरे पास मैं और वो
जाने मुझ में जिस्म और कोई रूह हो
सुबह की पहली किरण और वो
जाने जीने की भी कोई नई उम्मीद हो
एक तरफ आसमान और वो
जाने कोई जमीन पर रहता भी न हो
एक मेरा भ्रम और वो
जाने कोई तो नहीं जैसे की वो
होली के वो रंग और वो
जाने कोई लिया गया हाथ मे पानी हो

