महबूब
महबूब
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जिसके अंदर जीना था उसके अंदर मर गए
कहकर सबको जुठ उसे ये सच बता गए
रहना था हमे भी यहां कितने दिन!
कुछ पल के लिए आए और फिर बिछड़ गए
हमने किया है गुनाह हमे उसकी सजा दो
उसने न किया हमे माफ उसकी सजा दो
आए थे तुम तो खैर एक दोस्त बनकर
हमने तुमको महबूब माना उसकी सजा दो
जिसने भी जान रखा है वो जुठ है
दो ही जाने और वो भी चुप है
हमने किया खुदको बरबाद
जाना कि सबका अपना अपना रूप है
हुस्न निकाल हमने उसका दिल देखा
खुदको न देखा उतना उसको देखा
ख्वाब के कुए में उतरते गए उतरते गए
तिश्नगी बढ़ा फिर हमने वंहा सराब देखा
