चूड़ी
चूड़ी
इस दिल पे भी, वो क्या सितम ढाती है
उंगली छूने नहीं देती, चूड़ी वाले को हाथ थमा देती है
उसकी हर खनक की आवाज़ क्या कहिये
सोये हुए को भी नींद से जगा देती है।
सोलह श्रृंगार क्या खूब सजता है उनपे
पर ये कांच की चूड़ी, चार चांद लगा देती है
इंद्रधनुष के रंगों में वो बात कहां
जो मेरे महबूब की कलाई को सजा देती है
आज भी ये दिल, धड़कता है नीलोफर
जब प्यार से वो चूड़ी की खनक सुना देती है।

