चौपाई छंद-
चौपाई छंद-
जय-जय हे भव सागर जग के ।
तुम ही हो मम कानन खग के ।।
माता मीठी जग है खारी ।
ईश्वर सम तुम तारण हारी ।।
राम-राम सिय सह तुम कहिए ।
गगन व्योम में सुख से रहिए ।।
कांति शांतिमय नित-नित धरिए ।
दर्द अल्प मिलता है सहिए ।।
आत्मज्ञान जब भी मिलता है ।
सत्य पुष्प अंतस जगता है ।।
प्रेम नीर जब-जब झरता है ।
हॅंसी खुशी मन में भरता है ।।
आनंद रहें सब सुख में हों ।
कोई कभी भी न दुख में हों ।।
हर्षित जग प्रेम प्रीत मय हो ।
विस्तृत रह हार जीत मय हो ।।
श्रृंगार बिना रूप अब फीका ।
सौंदर्य भाल सोहे टीका ।।
जीवन काया की माया है ।
रोता अब मनु की साया है ।।
शिक्षा हमको दीक्षा देती ।
जीवन नैया यह तो खेती ।।
सुख-दुख में भी समता लाती ।
ओज-शान्ति भर-भर के आती ।।
जीवन शिक्षा से महके हैं ।
भावों के चिड़िया चहके हैं ।।
बहती नदिया बन के मन में ।
हलचल हिरणी की जो वन में ।।
प्यारी दादी न्यारी नानी ।
ममता की वो होती धानी ।।
देखो-देखो उसकी सानी ।
सुनें सभी वो लोग कहानी ।।
जीवन ऐसी एक कहानी ।
कोई राजा कोई रानी ।।
हमको तुमको आज सुनानी ।
माता होती है सेनानी ।।
महका-महका लागे मधुबन ।
दर्शन दो प्रभु त्यागो लंबन ।।
कोमल श्यामल रुप है चंदन ।
सुख ही सुख हो बिसरे क्रंदन ।।
कल-कल हलचल करती बहती।
निर्मल पग-पग हरदम रहती ।।
जीवन कितने इसमें पलती ।
फिर भी निश्छल सब कुछ सहती ।।
नदिया कल-कल हर पल बहना ।
नित-नित साथ-साथ में रहना ।
नीर क्षीर ही होना तुमको ।
मोल तोल के लेना हमको ।।
क्षुधा उदर की तुम भी जानो ।
सहना दुष्कर इसको मानो ।।
भूख प्यास से मरते इतने ।
भोजन आखिर मिलते कितने ।।
